पत्तों पर शान से बैठीं ,ओस की ये बूंदे कितनी ख़ुशकिस्मत हैं,
इन्हें घर के किसी कोने में रहने का ठिकाना तो मिला,
और एक ये हैं बेचारे हमारे बेजान आंसू,
जिन्हें इन प्यासी निगाहों में भी पनाह न मिली....
माना हर किस्मत ख़ुशनसीब नहीं होती,
लेकिन मेरी जितनी बदनसीब भी नहीं होती,
एक तरफ इंतज़ार कर रही हैं, जहां भर की खुशियां...
तो दूसरी तरफ़ फिर सज रही है आंसूओं की नुमाइश..
फंसी हूं इसी कशमकश में....
वक़्त लाएगा इस ज़िदंगी में नया सवेरा..
या लिपट जाएगा मुझसे अंधेरे का साया ?
शनिवार, 13 फ़रवरी 2010
पिंजरे में परिदां
ज़िदंगी की तस्वीर में मौत का रंग भरने से पहले,
ग़मों के नाज़ुक जाम का इन लबों से टकराने के पहले,
दे जाओ वक़्त को अपने होठों की हंसी,
भर लो निगाहों में लम्हों के दर्द की नमी,
इस पिंजरे से उस परिदें के उड़ने के पहले......
ग़मों के नाज़ुक जाम का इन लबों से टकराने के पहले,
दे जाओ वक़्त को अपने होठों की हंसी,
भर लो निगाहों में लम्हों के दर्द की नमी,
इस पिंजरे से उस परिदें के उड़ने के पहले......
शुक्रवार, 29 जनवरी 2010
क्या बात थी......
लहरों पर आराम से चलती ये ज़िदंगी
तो क्या बात थी.....
वक़्त के साथ करवट ना बदलती ये ज़िदंगी
तो क्या बात थी....
तूफ़ान से गुजरकर साहिल तक पहुंच जाते अगर हम....
तो कहते, मंज़िल तक पहुंच गए,
अब कहो क्या बात थी....
पर, कहानी के कुछ पन्ने अभी भी अधूरे हैं,
क्योंकि वक़्त के हाथों की कलम से अभी दूर हैं...
जिस दिन पड़ेगी उसकी, उन सफेद काग़ज़ों पर नज़र..
हम कहेंगे,ग़म ने फिर रंग दी हमारी ज़िदंगी..
अब कहो क्या बात थी ?
बनकर टूटते घरौदों को तो,इन निगाहों ने बहुत देख लिया...
एक टूटते आशियाने को फिर संवरते देख लेते...
तो हम भी कहते कि क्या बात थी.....
पर इन निगाहों को ये मंज़र इतनी आसानी से नसीब कहां होगा...
अगर होता तो ये निगाहें कहती...
अब बस....
इस नज़ारे को देख पलकें बंद करने को जी चाहता है..
और हम कहते, हां कर लो....
अब ख़त्म हर बात है...............
तो क्या बात थी.....
वक़्त के साथ करवट ना बदलती ये ज़िदंगी
तो क्या बात थी....
तूफ़ान से गुजरकर साहिल तक पहुंच जाते अगर हम....
तो कहते, मंज़िल तक पहुंच गए,
अब कहो क्या बात थी....
पर, कहानी के कुछ पन्ने अभी भी अधूरे हैं,
क्योंकि वक़्त के हाथों की कलम से अभी दूर हैं...
जिस दिन पड़ेगी उसकी, उन सफेद काग़ज़ों पर नज़र..
हम कहेंगे,ग़म ने फिर रंग दी हमारी ज़िदंगी..
अब कहो क्या बात थी ?
बनकर टूटते घरौदों को तो,इन निगाहों ने बहुत देख लिया...
एक टूटते आशियाने को फिर संवरते देख लेते...
तो हम भी कहते कि क्या बात थी.....
पर इन निगाहों को ये मंज़र इतनी आसानी से नसीब कहां होगा...
अगर होता तो ये निगाहें कहती...
अब बस....
इस नज़ारे को देख पलकें बंद करने को जी चाहता है..
और हम कहते, हां कर लो....
अब ख़त्म हर बात है...............
बुधवार, 27 जनवरी 2010
लम्हा
लम्हा लम्हा इंतज़ार करते हैं, एक लम्हें के लिए,
वो लम्हें आते भी हैं तो सिर्फ़ एक लम्हें के लिए.....
वो लम्हें आते भी हैं तो सिर्फ़ एक लम्हें के लिए.....
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