शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

क्या बात थी......

लहरों पर आराम से चलती ये ज़िदंगी
तो क्या बात थी.....
वक़्त के साथ करवट ना बदलती ये ज़िदंगी
तो क्या बात थी....
तूफ़ान से गुजरकर साहिल तक पहुंच जाते अगर हम....
तो कहते, मंज़िल तक पहुंच गए,
अब कहो क्या बात थी....
पर, कहानी के कुछ पन्ने अभी भी अधूरे हैं,
क्योंकि वक़्त के हाथों की कलम से अभी दूर हैं...
जिस दिन पड़ेगी उसकी, उन सफेद काग़ज़ों पर नज़र..
हम कहेंगे,ग़म ने फिर रंग दी हमारी ज़िदंगी..
अब कहो क्या बात थी ?
बनकर टूटते घरौदों को तो,इन निगाहों ने बहुत देख लिया...
एक टूटते आशियाने को फिर संवरते देख लेते...
तो हम भी कहते कि क्या बात थी.....
पर इन निगाहों को ये मंज़र इतनी आसानी से नसीब कहां होगा...
अगर होता तो ये निगाहें कहती...
अब बस....
इस नज़ारे को देख पलकें बंद करने को जी चाहता है..
और हम कहते, हां कर लो....
अब ख़त्म हर बात है...............

बुधवार, 27 जनवरी 2010

लम्हा

लम्हा लम्हा इंतज़ार करते हैं, एक लम्हें के लिए,
वो लम्हें आते भी हैं तो सिर्फ़ एक लम्हें के लिए.....