शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

ये कैसी कशमकश ?

पत्तों पर शान से बैठीं ,ओस की ये बूंदे कितनी ख़ुशकिस्मत हैं,
इन्हें घर के किसी कोने में रहने का ठिकाना तो मिला,
और एक ये हैं बेचारे हमारे बेजान आंसू,
जिन्हें इन प्यासी निगाहों में भी पनाह न मिली....
माना हर किस्मत ख़ुशनसीब नहीं होती,
लेकिन मेरी जितनी बदनसीब भी नहीं होती,
एक तरफ इंतज़ार कर रही हैं, जहां भर की खुशियां...
तो दूसरी तरफ़ फिर सज रही है आंसूओं की नुमाइश..
फंसी हूं इसी कशमकश में....
वक़्त लाएगा इस ज़िदंगी में नया सवेरा..
या लिपट जाएगा मुझसे अंधेरे का साया ?

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

अपनी तुलना केवल अपने आप से करें.....ओस की बूंदों को भगवान बनाता हैं और आंसूओं को इंसान...कशमकश में ना रहकर जीवन जीएं